OR
क्या तुम नहीं जानते
क्या तुम नहीं जानते
पर्वतों के पीर को,
व्याकुल संसार के
संपन्न तस्वीर को।
क्या तुम नहीं जानते
जलती हवा के शरीर को ,
जो दोड रहा है गाड़ियों के
पीछे पाने अपने तकदीर को ।
क्या तुम नहीं जानते
पानी कि गरीबी को ,
जो मांग रहा साफ कपड़ा
मिटाने तन की फकीरों को ।
क्या तुम नहीं जानते
आसमान के काले रंग को ,
जो ढूंढ रहा है नीला सूरज
बुला रहा है अपने पतंग को।
क्या तुम नहीं जानते
कमजोरी से कापते शरीर को ,
शुद्ध अनाज और अशुद्ध अनाज
के बीच मिटाना चाहता लकीर को।
बिंदेश कुमार झा
| Rank | Name | Points |
|---|---|---|
| 1 | Manish_5 | 408 |
| 2 | Srivats_1811 | 287 |
| 3 | Infinite Optimism | 125 |
| 4 | Sarvodya Singh | 116 |
| 5 | AkankshaC | 93 |
| 6 | Udeeta Borpujari | 86 |
| 7 | Rahul_100 | 68 |
| 8 | Rahul Gupte | 66 |
| 9 | June | 55 |
| 10 | Anshika | 53 |
| Rank | Name | Points |
|---|---|---|
| 1 | Udeeta Borpujari | 551 |
| 2 | Srivats_1811 | 311 |
| 3 | Sarvodya Singh | 279 |
| 4 | Rahul_100 | 250 |
| 5 | AkankshaC | 195 |
| 6 | Infinite Optimism | 179 |
| 7 | Anshika | 152 |
| 8 | Kimi writes | 150 |
| 9 | Wrsatyam | 148 |
| 10 | aditya sarvepalli | 139 |
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